न्यू टेस्टामेंटHIOV

इफिसियों के नाम पौलुस प्रेरित की पत्री 4

1इसलिये मैं जो प्रभु में बन्दी हूँ तुम से विनती करता हूँ कि जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो,

2अर्थात् सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो; ⓐ

3और मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो।

4एक ही देह है, और एक ही आत्मा; जैसे तुम्हें जो बुलाए गए थे अपने बुलाए जाने से एक ही आशा है।

5एक ही प्रभु है, एक ही विश्‍वास, एक ही बपतिस्मा,

6और सब का एक ही परमेश्‍वर और पिता है, जो सब के ऊपर और सब के मध्य में और सब में है।

7पर हम में से हर एक को मसीह के दान के परिमाण के अनुसार अनुग्रह मिला है।

8इसलिये वह कहता है : “वह ऊँचे पर चढ़ा और बन्दियों को बाँध ले गया, और मनुष्यों को दान दिए।” ⓑ

9(उसके चढ़ने से, और क्या पाया जाता है केवल यह कि वह पृथ्वी की निचली जगहों में उतरा भी था।

10और जो उतर गया यह वही है जो सारे आकाश से ऊपर चढ़ भी गया कि सब कुछ परिपूर्ण करे)।

11उसने कुछ को प्रेरित नियुक्‍त करके, और कुछ को भविष्यद्वक्‍ता नियुक्‍त करके, और कुछ को सुसमाचार सुनानेवाले नियुक्‍त करके, और कुछ को रखवाले और उपदेशक नियुक्‍त करके दे दिया,

12जिस से पवित्र लोग सिद्ध हो जाएँ और सेवा का काम किया जाए और मसीह की देह उन्नति पाए,

13जब तक कि हम सब के सब विश्‍वास और परमेश्‍वर के पुत्र की पहिचान में एक न हो जाएँ, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएँ और मसीह के पूरे डील-डौल तक न बढ़ जाएँ।

14ताकि हम आगे को बालक न रहें जो मनुष्यों की ठग-विद्या और चतुराई से, उन के भ्रम की युक्‍तियों के और उपदेश के हर एक झोंके से उछाले और इधर-उधर घुमाए जाते हों।

15वरन् प्रेम में सच्‍चाई से चलते हुए सब बातों में उसमें जो सिर है, अर्थात् मसीह में बढ़ते जाएँ,

16जिससे सारी देह, हर एक जोड़ की सहायता से एक साथ मिलकर और एक साथ गठकर, उस प्रभाव के अनुसार जो हर एक अंग के ठीक-ठीक कार्य करने के द्वारा उस में होता है, अपने आप को बढ़ाती है कि वह प्रेम में उन्नति करती जाए। ⓒ

17इसलिये मैं यह कहता हूँ और प्रभु में आग्रह करता हूँ कि जैसे अन्यजातीय लोग अपने मन की अनर्थ रीति पर चलते हैं, तुम अब से फिर ऐसे न चलो।

18क्योंकि उनकी बुद्धि अन्धेरी हो गई है, और उस अज्ञानता के कारण जो उनमें है और उनके मन की कठोरता के कारण वे परमेश्‍वर के जीवन से अलग किए हुए हैं;

19और वे सुन्न होकर लुचपन में लग गए हैं कि सब प्रकार के गन्दे काम लालसा से किया करें।

20पर तुम ने मसीह की ऐसी शिक्षा नहीं पाई।

21वरन् तुम ने सचमुच उसी की सुनी और, जैसा यीशु में सत्य है, उसी में सिखाए भी गए

22कि तुम पिछले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को जो भरमानेवाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्‍ट होता जाता है, उतार डालो ⓓ

23और अपने मन के आत्मिक स्वभाव में नये बनते जाओ,

24और नये मनुष्यत्व को पहिन लो जो परमेश्‍वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है। ⓔ

25इस कारण झूठ बोलना छोड़कर हर एक अपने पड़ोसी से सच बोले, क्योंकि हम आपस में एक दूसरे के अंग हैं। ⓕ

26क्रोध तो करो, पर पाप मत करो; सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे, ⓖ

27और न शैतान [1] को अवसर दो।

28चोरी करनेवाला फिर चोरी न करे, वरन् भले काम करने में अपने हाथों से परिश्रम करे, इसलिये कि जिसे प्रयोजन हो उसे देने को उसके पास कुछ हो।

29कोई गन्दी बात तुम्हारे मुँह से न निकले, पर आवश्यकता के अनुसार वही निकले जो उन्नति के लिये उत्तम हो, ताकि उससे सुननेवालों पर अनुग्रह हो।

30परमेश्‍वर के पवित्र आत्मा को शोकित मत करो, जिस से [2] तुम पर छुटकारे के दिन के लिये छाप दी गई है।

31सब प्रकार की कड़वाहट, और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा, सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए।

32एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्‍वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो। ⓗ